महान गणितज्ञ आर्यभट्ट की जीवनी और आर्यभट्ट की महत्वपूर्ण खोज

महान गणितज्ञ आर्यभट्ट की जीवनी और आर्यभट्ट की महत्वपूर्ण खोज

आर्यभट्ट प्राचीन भारत के महान ज्योतिषविद् और गणितज्ञ थे। इन्होंने आर्यभटीय ग्रंथ की रचना 499 में की थी। इसी ग्रंथ की रचना कलयुग के 3600 साल बित जाने के बात की थी। 23 साल के उम्र में ही ग्रंथ की रचना कर लिये थे। इसी ग्रंथ केअनुसार इन्होंने अपना जन्म स्थान बिहार के कुसुमपुर वर्तमान नाम पटना में शक संवत् 398 हुआ था।

एक अन्य मान्यता के अनुसार आर्यभट्ट का जन्म महाराष्ट्र के अश्मक देश में हुआ था। लेकिन आर्यभट्ट जन्म 476 ई. को कुसुमपुर दक्षिण में हुआ था, यह अब लगभग सिद्ध हो चुका है। आर्यभट्ट के जन्म के वर्ष का आर्यभटीय में स्पष्ट लिखा है, लेकिन उनके जन्म स्थान को लेकर हमेशा विवाद ही हुआ है। कुछ मानते हैं कि उनका जन्म नर्मदा और गोदावरी नदी के मध्य क्षेत्र में हुआ था, यानि दक्षिण में हुआ था। एक ताजा अध्ययन के अनुसार केरल के चाम्रवत्तम में हुआ था।

आर्यभट्ट ने उच्च शिक्षा कुसुमपुरा (पटना) के नालन्दा विश्वविद्यालय में लि थी। ऐसा संभव है कि गुप्तकाल में आर्यभट्ट वहाँ रहा करते थे। गुप्तकाल को भारत के स्वर्णिम युग के रूप में भी जाना जाता है। इतिहासकारों में इनके जन्म स्थान को लेकर सहमती नहीं हैं। आर्यभट को हम आर्यभट्ट बोलते और लिखते हैं, पर उनका सही नाम आर्यभट ही है।

आर्यभट्ट के आर्य-सिद्धांत ज्योतिषीय और खगोलीय गणनाओं के लिये है, जो अब लुप्त हो चुका है। इसके बारे में जो भी जानकारी मिलती है, वह ब्रह्मगुप्त, भास्कर प्रथम और अन्य टिप्पणीकारों लेखनों में मिलती है या फिर आर्यभट्ट के समकालीन वराहमिहिर के लेखनों में मिलती है। इस ग्रंथ में पुराने सूर्य सिद्धांत के बारे में बातया गया है, और दिवस गणना के लिय सूर्योदय की अपेक्षा मध्यरात्रि को का उपयोग किया गया है।

आर्य-सिद्धांत ग्रन्थ में खगोलीय उपकरणों बारे में बातया गया है, जैसे शंकु-यन्त्र, छाया-यन्त्र, कोण मापी उपकरण, अर्धवृत्ताकार और वृत्ताकार, एक बेलनाकार छड़ी यस्ती-यन्त्र, छत्र- यन्त्र, दो प्रकार की जल घड़ियाँ- धनुषाकार और बेलनाकार आदि। एक और ग्रंथ है, जिसे अरबी भाषा में है। यह ग्रंथ को न्त्फ़ या अल नन्फ़ नाम से जाना जाता है। यह फारसी विद्वान और भारतीय इतिहासकार अबू रेहान अल-बिरूनी द्वारा उल्लेखित किया गया है। आर्यभट्ट ने ही त्रिकोणमिती के Sin और Cosine खोज़ की थी , जो आज पूरी दुनिया में जो त्रिकोणमिति पढ़ाया जाता है। आर्यभटीय के गणितीय भाग में अंकगणित, बीजगणित, सरल त्रिकोणमिति और गोलीय त्रिकोणमिति के बारे में बतायें हैं।

आर्यभट्ट ने चार ग्रंथ दशगीतिका, आर्यभटीय, तंत्र और आर्यभट्ट सिद्धांत की रचना की थी। इतिहासकारों के अनुसार एक ही ग्रंथ आर्यभट्ट सिद्धांत लिखे थे, लेकिन इस ग्रन्थ के केवल 34 श्लोक ही हैं। उन्होंने आर्यभटीय ज्योतिष ग्रन्थ लिखें, जिसमें वर्गमूल, घनमूल, समान्तर श्रेणी और विभिन्न अलग-अलग प्रकार के समीकरणों का वर्णन है। यह ग्रन्थ खगोल विज्ञान और गणित का एक संग्रह है। आर्यभटीय में लिखे श्लोक को चार भाग गीतिकपाद, गणितपाद, कालक्रियापाद और गोलपाद में विभाजित है।

1. गीतिकपाद- गीतिकपाद में 13 श्लोक है, इन श्लोको में ब्रह्म और परब्रह्म की वंदना की गई है। इस में ब्रह्माण्ड विज्ञान, ज्योतिष, त्रिकोणमिती और ग्रहों के परिभ्रमण प्रस्तुत की गयी है।

2. गणितपाद- गणितपाद में 33 श्लोक है। इन श्लोकों में अंकगणित, बीजगणित और रेखागणित की जानकारी है।

3. कालक्रियापाद – कालक्रियापाद में 25 श्लोक है। इन श्लोकों में ग्रहों की गति और ग्रहों की स्थिति की जानकारी दी गई है। दिनों के नाम के साथ 7 दिन का एक सप्ताह के रूप प्रस्तुत में करते हैं।

4. गोलपाद- गोलपाद में 50 श्लोक है। गोलपाद में 50 श्लोक है। इन श्लोकों में पृथ्वी के आकार, दिन और रात के कारण, ग्रहों की गतियों, सूर्य से दूरी, सूर्य ग्रहण और चंद्र ग्रहण की जानकारी दी गई है।अंतरिक्ष विज्ञान से जुड़ी जानकारी है।

गुप्तकाल को भारत के इतिहास में स्वर्णयुग के नाम से भी जाना जाता है। स्वर्णयुग में भारत ने साहित्य, कला और विज्ञान के क्षेत्रों काफी प्रगति की थी। आर्यभट्ट जीनालंदा विश्वविद्यालय के कुलपति भी थे। आर्यभट्ट का ज्योतिष सिद्धान्तों का गहरा प्रभाव विश्व में रहा है। इन्होंने ज्योतिष शास्त्र के सिद्धांत और ज्योतिष शास्त्र के गणित सूत्र अपने ग्रंथ में लिखा है। उन्होंने गणित में पाई (π) मान को बताया और खगोलविज्ञान में उदाहरण के साथ बताया की पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमती है। निकोलस कोपरनिकस ने जो खोज 1473 से 1543 ई. में की थी, उसकी खोज आर्यभट्ट ने हजार वर्ष पहले कर चुके थे। गोलपाद में लिखा है, कि पृथ्वी अपने अक्ष पर घूमती है। आर्यभट्ट के अनुसार 1कल्प में 14 मन्वंतर, 1 मन्वंतर में 72 महायुग और 1 महायुग में 4 युग के समान माना है। इसिलए चारों युग सतयुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग को समान माना है।

उन्होंने ने पृथ्वी की परिधि की लंबाई 39,968.05 किलोमीटर बताई जो असल लंबाई 40,075.01 किलोमीटर से मात्र 0.2 प्रतीशत कम है। उन्होंने ने कहा किसी भी वृत्त की परिधि और व्यास का संबंध 62,832 : 20,000 आता है तो दशमलव के चार स्थान तक मान है। पृथ्वी के घूमने की गति को माप कर बताया था कि 23 घंटे 56 मिनट और 4.1 सेकंड होती है, जो आज के समय से 3 मिनट 20 सेकंड कम है। आर्यभट्ट के अनुसार एक साल की लंबाई 365.25868 दिन होता है। जो कि आज के हिसाब से 365.25636 होता है, यह लगभग बराबर है। आर्यभट्ट के अनुसार चन्द्रमा को पृथ्वी के चक्कर लगाने में 27.32167 दिन लगता है। जो कि आज के हिसाब से 27.32166 दिन है। यह लगभग बराबर है।
आर्यभट्ट ने सूर्य ग्रहण और चंद्र ग्रहण लगने का समय और ग्रहण कितनी समय का होग, पता करने के लिए एक फार्मूला दियें हैं। उनके ही पहली बार बताया कि सौर मंडल के केंद्र में सूर्य है, और सूर्य सौर मंडल के बाकी ग्रह सूर्य की परिक्रमा करती है। साथ ही सूर्य से सौर मंडल बाकी ग्रहों की दूरी के बारे में बताया है।

भारत के इस महान वैज्ञानिक, गणितज्ञ और ज्योतिषविद् को पूरी दुनिया सम्मान करती है। आर्यभट्ट के सम्मान में भारत के पहले उपग्रह का नाम आर्यभट्ट रखा गया था। आर्यभट की रचना ने कई संस्कृतियों को भी प्रभावित किया, जैसे अरबी विद्वान अल-बिरूनी आर्यभट्ट के अनुयायी मानते थे। आर्यभट्ट और उनके अनुयायियों द्वारा की गयी तिथि गणना पंचांग हिंदू धर्म में प्रयोग आज किया जाता है, और इस्लामी दुनिया जलाली तिथिपत्र का आधार 1073 में तैयार किया गया था। 1925 में संशोधित कर आज ईरान और अफगानिस्तान में राष्ट्रीय कैलेंडर के रूप में प्रयोग किया जाता है।

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